शुक्रवार, 8 मार्च 2013

गुरु ....राहू /केतु युति ....चंडाल योग ......सत्य
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गुरु ....राहू /केतु युति .से चंडाल योग बनता हे ....चंडाल का मतलब नीच काम करनेवाला
क्या ? यह युति से ही चंडाल योग बनेगा

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जीवे राहूयुतेSथवा शिखीयुते पापेक्षित निचकृत|
निचे नीचसमीक्षिते सुरगुरौ विप्रोSपि दुष्कर्म कृतम ||(जातक पारिजात ५/६)
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भावार्थ
गुरु जब राहू अथवा केतु (राहूयुतेSथवा शिखीयुते) के साथ युति करता हे और पाप ग्रह उसको देखते हो तो जातक नीच (हलके ) कामो में प्रवृत होता हे ,गुरु नीच का हो और उसके कोई नीच ग्रह देखता हो तो वह जातक ब्राह्मण हो तो भी नीच कम करता हे ...|
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जातक पार्रिजत के इस श्लोक से यह ज्ञान पड़ता हे की सिर्फ गुरु ...राहू/केतु युति मात्र से ही चंडाल योग नहीं बनता शर्त यह भी हे की यह युति पाप प्रभाव से युक्त हो तब ही इसका बुरा प्रभाव पड़ेगा और गुरु नीच का नीच ग्रह के प्रभाव में हो तब भी चंडाल योग कहा जायेगा
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गुरु ....राहू /केतु युति ....हर पत्रिका में चंडाल योग का निर्माण नहीं करेगी

लघु पराशरी में कहा गया हे राहू .केतु केंद्र में त्रिकोणेष के साथ और त्रिकोण में केन्द्रेश के साथ होने से राजयोग का निर्माण होता हे यदि केन्द्रेश /त्रिकोणेष गुरु बनेगा तो इस का योग फल मिलेगा ......

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