शनिवार, 17 अगस्त 2013

मारक विचार ....

मारक विचार ....
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मारक व्याख्या
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अष्टमं ह्यायूष: स्थानमष्टमादष्टमं च यत् |
तयोरपि व्ययस्थानं मारकस्थानमुच्यते ||
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अर्थ
जन्म लग्न से अष्टम स्थान आयुष्य स्थान हे तथा अष्टम स्थान से अष्टम (तृतीय )स्थान भी आयुष्य स्थान हे यह दोनों आयुष्य स्थान से द्वादश स्थान को मारक स्थान कहा जाता हे
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प्रस्तुत श्लोक में मारक ग्रह की व्याख्या की हे जन्म लग्न से अष्टम स्थान आयु का स्थान हे "भावत् भावम् " नियम अनुसार अष्टम से अष्टम तृतीय स्थान भी आयुष्य स्थान हे यह दोनों आयु स्थान से द्वादश स्थान मारक स्थान हे सप्तम और द्वितीय स्थान निश्चित हुए
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तत्राप्याद्यव्ययस्थनाद् द्वितीयं बलवत्तरम्|
तदीशितुस्तत्र गता: पापिनस्तेन संयुता:||
तेषां दषाविपोकेषु संभवे निधंम नृणाम्|
तेषामसंभवे साक्षाद् व्ययाधीशदशास्वपि||
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अर्थ
दोनों मारक स्थान (द्वितीय /सप्तम )में सप्तम स्थान से ज्यादा द्वितीय मारक स्थान बलवान हे मारक स्थान में पाप ग्रह हो और मारकेश से युक्त हो तो
मारक स्थान स्थित पाप ग्रह की महादशा /अन्तर्दशा में मृत्यु होती हे
जो उसकी दशा में मृत्यु संभव न हो तो जन्म लग्न से व्ययेश की दशा में मृत्यु
होती हे
प्रस्तुत श्लोक में मारक का निर्णय केसे करना हे यह दर्शाया हे दोनों मारक स्थान में द्वितीय मारक स्थान ज्यादा बलवान कहा गया हे मारक स्थान में पाप ग्रह मारकेश से युक्त हो तो मारक स्थान स्थित पाप ग्रह की दशा अंतर में मृत्यु होती हे ऐसा संभव न हो तो द्वितीयेश की दशा में मृत्यु होती हे इस में भी मृत्यु संभव न हो तो सप्तमेश की दशा में मृत्यु होती हे
यहाँ मारक स्थान स्थित पाप ग्रह को प्रबल मारक कहा गया हे तद्पश्च्यात मारकेश स्वयं मारक बनता हे अगर यह भी संभव न हो तो व्ययेश की दशा में
मृत्यु होती हे
यहाँ 'संभव "शब्द सूचित करता हे की मारक स्थान स्थित पाप ग्रह की दशा या मारकेश की दशा अंतर में मृत्यु हो जाये यह निश्चित नही हे
मृत्यु का संभव कब होता हे यह जानना जरुरी हे
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वैदिक ज्योतिष में आयु निर्णय के लिए पूर्वाचार्यो ने विभाग निश्चित किये हे
१)अल्पायु -जन्म से ३२ वर्ष
२)मध्यम आयु -३२ से ६४
४)दीर्घ आयु -६४ से १००
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जैमिनी सूत्र अनुसार आयु निर्णय
१)लग्नेश अष्टमेश चर राशी में हो अथवा लग्नेश स्थिर राशी में और अष्टमेश द्विस्वभाव राशी में हो अथवा लग्नेश द्विस्वभाव राशी में और अष्टमेश स्थिर राशी में हो तो दीर्घ आयु
लग्नेश और अष्टमेश द्विस्वभाव राशी में हो अथवा लग्नेश चर राशी में और अष्टमेश स्थिर राशी में हो अथवा लग्नेश स्थिर राशी में और अष्टमेश चर राशी में हो तो मध्यम आयु
लग्नेश +अष्टमेश -स्थिर राशी
लग्नेश चर राशी +अष्टमेश द्विस्वभाव राशी
लग्नेश द्विस्वभाव राशी +अष्टमेश चर राशी में हो तो अल्प आयु
२)लग्नेश तथा शुभ ग्रह केंद्र में हो तो दीर्घ आयु
पणफर में हो तो मध्यम आयु
ओपोकिलम में हो तो अल्पायु
३)अष्टमेश तथा पाप ग्रह केंद्र में हो तो अल्प आयु
पणफर में हो तो मध्यम आयु
ओपोकिलम में हो तो दीर्घ आयु
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उपरोक्त नियम अनुसार या अन्य आयु निर्णय के नियम अनुसार जातक अल्पायु ,मध्यम आयु ,या दीर्घ आयु हे यह निर्णय कर के जातक के मृत्यु का अनुमान करना चाहिए और इस काल समय में आने वाली मारक दशा में मृत्यु का फलादेश संभव हो सकता हे उस से पहेले आने वाली मारक दशा में मृत्यु नही होती पर शारीरिक कष्ट या मृत्यु तुल्य कष्ट संभव हे
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उपरोक्त सिध्धांत अनुसार मारक की स्थिति
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१)२,७,१२ मारक स्थान हे
२)मारक स्थान के अधिपति मारक बनते हे
३)मारक स्थान स्थित ग्रह मारक बनते हे
४)द्वितीयेश ,सप्तमेश युक्त ग्रह मारक बनते हे
५)पाप ग्रह मारक ग्रह से द्रष्ट या युक्त हो तो मारक बनते हे
६)द्वितीयेश /सप्तमेश चन्द्र या सूर्य हो तो मारक नही बनते
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बारह लग्न में मारक ग्रह
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१)मेष -शुक्र बुध ,शनि मारक बनते हे (शुक्र दशा में मृत्यु नही होती कष्ट होता हे )
२)वृषभ लग्न -बुध और मंगल मारक हे (बुध द्वितीय /सप्तम स्थान में हो तब मारक बनता हे )गुरु मारक के गुणों से युक्त हो तो मारक बनता हे
३)मिथुन लग्न -मंगल मारक बनता हे चन्द्र मारक नही बनता
४)कर्क लग्न - बुध ,शुक्र ,शनी का मारक के रूप में विचार करना चाहिए .यहाँ सूर्य मारक नही बनता
५) सिंह लग्न -बुध ,शनि
६)कन्या लग्न -मंगल प्रबल मारक साथ में गुरु का विचार करना चाहिए शुक्र मारक नही बनेगा
७)तुला लग्न - गुरु प्रबल मारक ..मंगल
८)वृश्चिक -बुध ,शुक्र ,शनि
९)धनु -शुक्र ,शनि
१०)मकर - गुरु ,साथ में मंगल का विचार करना चाहिए
११)कुम्भ -गुरु ,पाप ग्रह मारक बनते हे
१२)मीन -शुक्र ,शनि ...मंगल मारक नही बनेगा
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साभार -लघु पाराशरी

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