गुरुवार, 12 जुलाई 2018

ક્લાઉડ ડિપ્રેશન
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આકાશ એ ગુરુ છે અને આકાશ માં છવાએલ વાદળો એ રાહુ સ્વરૂપ છે ભલે ખેતી ને અર્થ શાસ્ત્રનો આધાર માનવવાળા જનમાનસ માં વાદળ જોઈ ને મન ખુશ થઇ જતું હોય પણ વધુ દિવસ સુધી આકાશ માં વાદળ નો જમાવડો રાહુ ના પ્રભાવ ને વધારે છે અને ઘણા લોકો આના થી માનસિક રીતે વ્યથિત થતા જાય છે આને મોન્સૂન ડિપ્રેશન પણ કહે છે
મહિલાઓ માં મોન્સૂન ડિપ્રેશન નું પ્રમાણ પુરુષો કરતા વધુ હોય જોવા મળે છે
જ્યોતિષશાસ્ત્ર માં ગુરુ ને સપોર્ટ કરવા માટે નાહવાના પાણી માં લીંબુ ના રસ ના 4 ટીપા નાખી ને સ્નાન કરવા નો ઉપાય બતાવેલ છે
જો રોજ સવારે નહાવાના પાણી માં આ પ્રમાણે લીંબુ ના રસ ના ટીપા મેળવવા માં આવે તો આકાશ તત્વ ઉપર રહેલ રાહુ એટલે વાદળો ની નકારાત્મક ને ઓછી કરી શકાય છે
જે જાતકો ની કુંડળી માં ગુરુ કોઈ કારણ થી દુષપ્રભાવ માં હોય તેમજ
રાહુ +ગુરુ
ચંદ્ર +રાહુ
શનિ + રાહુ
લગ્નેશ +રાહુ
જેવી યુતિઓ હોય તો લીંબુવાળો ઉપાય જરૂર કરવો જોઈએ

गुरुवार, 5 सितंबर 2013

व्यवसाय निर्णय विचाराधीन बिंदु

व्यवसाय निर्णय विचाराधीन बिंदु
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जन्मकुंडली का प्रथम स्थान लग्न बिंदु जो जीवन का आरम्भ बिंदु हे, लग्न भाव से जातक की गुप्त शक्तिया ,जीवन की स्थिरता /अथिरता ,बल,,लग्न भाव से ही होती हे
अत: किसी भी जातक के जीवन के लिए लग्न को लक्ष्य में लेना जरुरी हे
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चन्द्र
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जातक की मन:स्थिति उसके कार्य करने गतिविधि का आधार उसका मानसिक रवैया और आवेग पर ज्यादा रहेता हे व्यापार में होनेवाले लाभ /हानि को झेल सके इस लिए यहाँ चन्द्र का भी विचार आवश्यक हे
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बुध
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बुध बुध्धि के साथ व्यापार का भी कारक ग्रह हे अत: यहाँ बुध का भी महत्त्व कम नही हे
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सूर्य
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सूर्य ग्रह जीवन शक्ति का द्योतक हे ,पृथिवी का कोई भी प्रदार्थ सूर्य के बिना संभव नही सूर्य सर्व जीवो का प्राण और मानव शरीर का आत्मा हे
सूर्य की जन्म कुंडली में स्थिति के आधार पर जातक की शक्ति ,बल ,आत्मा ,विचार होता हे
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दसम स्थान /चतुर्थ स्थान
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लग्न भाव विचार दसम स्थान उस विचार का कार्य (कर्म ) हे
व्यवसाय निर्णय के लिए कर्म स्थान देखना आवश्यक हे ,जातक के किये हुए कर्म के आधार पर इच्छित सुख प्राप्त होगे या नही उसका निर्णय चतुर्थ भाव से मिलता हे जातक कितना भी महेन्तु ,उद्यमी हो पर उसे जीवन में सुख की प्राप्ति न हो तो कर्म का कोई औचित्य नही रहेगा कर्म की सफलता ही सुख हे

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नवम भाव (भाग्य )
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जातक के विचार ,कर्म ,सुख की इच्छा भाग्य से ही होती हे यह उसके भाग्य में हे या नही यह भी जनना जरुरी हे
नवम स्थान दसम से द्वितीय हे इसका मतलब भाग्य ही कर्म को जन्म देता हे भाग्य पहेले कर्म उसके बाद आता हे ,भाग्य के बिना सब अर्थ हिन् हो जाता हे
किसी भी कार्य का विचार करो कर्म के मध्यम से उसका अमल करने मात्र से सुख नही मिलता या सिध्धि के लिए किये हुए कर्म से सिध्धि मिलती हे ऐसा भी नही हे भाग्य होगा तो कर्म फलता हे
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आत्म कारक ग्रह
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जातक के जन्म समय पर नभोमंडल में जो ग्रह ज्यादा अंश का होता हे वह ग्रह आत्म कारक कहेलाता हे आत्मकारक ग्रह के आधार पर जातक की आजीविका का क्षेत्र तय होता हे आत्मकारक ग्रह बलवान होगा तो व्यक्ति व्यापार के क्षेत्र में उच्च स्थान पर पहुचेगा
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कारकांश कुंडली
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आत्मकारक ग्रह नवमांश कुंडली में जिस राशी में होता हे उस राशी को लग्न मान कर अन्य ग्रह नवमांश कुंडली के अनुसार जिस जिस राशी में हो उस राशी में रखने से कारकांश कुंडली बनती हे
कारकांश कुंडली का दशम भाव और लग्न के आधार पर भी व्योपार के क्षेत्र का विचार किया जाता हे
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शनिवार, 17 अगस्त 2013

नवमांश कुंडली (D9 चार्ट )

नवमांश कुंडली (D9 चार्ट )
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भारतीय ज्योतिष शास्त्र में ,जन्म लग्न ,चन्द्रलग्न कुडली के अतिरिक्त विविध वर्ग कुडली होरा,द्रेष्काण,सप्तमाश,नवमांश ,द्वादशांश ,त्रिंशांश का महत्व विशेष माना गया हे इन में नवमांश कुंडली का महत्व सविशेष हे
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नवमांश को इतना महत्व क्यों ??
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||"नून नवांशे तू कलत्रसौख्यं "|| नवमांश से पति या पत्नी का सुख देखा जाता हे
यह कहा गया हे पर उस से अतिरिक्त नवमांश कुंडली का महत्व इस लिए अन्य वर्ग कुंडली से बढ़ जाता हे की नवमांश कुंडली से मूल जन्म कुडली के ग्रहों का बलाबल भी देखा जाता हे ,

नवमांश कुंडली सोधन
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३०अन्श की एक राशि ३ अंश २०" के ९ समान भाग
३ अंश २०" = एक नवमांश
१)मेष ,सिंह ,धन .......मेषादि राशि (अग्नि तत्व )
२)वृषभ ,कन्या ,मकर ...मकरदि राशि (पृथ्वी तत्व )
३)मिथुन ,तुला, कुम्भ ... तुलादि राशि (वायु तत्व )
४)कर्क ,वृश्र्चिक ,मीन ..कर्कादि राशि (जल तत्व )
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अग्नि तत्व समूह राशी ओ का नवमांश मेष से शुरू होता हे
पृथ्वी तत्व समूह राशी ओ का नवमांश वृषभ से शुरू होता हे
वायु तत्व समूह राशी ओ का नवमांश तुला से शुरू होता हे
जल तत्व समूह राशी ओ का नवमांश कर्क से शुरू होता हे
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नवमांश भाग
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०० अंश ०० to ३ अंश २०" (1st part)
३ अंश २०" to ६ अंश ४०" - (2nd part)
६अंश ४०" to १० अंश ००"(3rd part)
१०अंश००" to १३ अंश २० "(4th part )
१३ अंश २०" to १६ अंश ४० " (5th part )
१६ अंश ४०" to २० अंश ००"(6th part)
२० अंश ००" to २३ अंश २०"(7th part )
२३ अंश २०" to २६ अंश ४०" (8th part )
२६ अंश ४०" to ३० अंश ००" (9th part )
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त्रिकोण में आनेवाली तीनो राशिया अग्नि ,पृथ्वी ,वायु,जल यह चारो तत्व में से एक होती हे
ग्रह या लग्न किस नवमांश में हे यह जानने के लिए ऊपर दिए गए त्रिकोण समूह में से गृह या लग्न किस समूह में आता हे और उस के अंश कितने हे यह देखना होगा
ex. सूर्य -००-२६-५४-४२
यहाँ सूर्य के राशि अग्नितत्व समूह में नवमाश भाग के (9th part ) में सम्मिलित होता हे अत: मेष से सुरु कर ९ मी राशी धनु हे तो यहाँ सूर्य धनु राशी के नवमांश में आएगा

विवाह मुहूर्त विचार

विवाह मुहूर्त विचार
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विवाह के माह |
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वृश्चिक के सूर्य में कार्तिक शुक्ल पक्ष एकादशी से कार्तिक में ,मार्गशीष में ,मकर के सूर्य में पोष तथा माघ में ,कुम्भ के सूर्य में फाल्गुन में ,मेष के सूर्य में चैत्र एवम वैशाख ,ज्येष्ठ और आषाढ़ शुक्ल पक्ष दशमी तक वृषभ मिथुन के सूर्य में विवाह /लग्न करने चाहिए
अन्य आचार्यो के मत अनुसार धनु के सूर्य में मार्गशीर्ष में तथा मीन के सूर्य में फाल्गुन में विवाह कहे गए हे ..यह धनार्क ,मिनार्क समय में गुजरात ,सौराष्ट्र ,कच्छ प्रान्त में विवाह नही लिए जाते और महाराष्ट्र में मार्गशीर्ष ,माघ ,फाल्गुन,वैशाख और ज्येष्ठ माह में विवाह मुहूर्त दिए जाते हे
दक्षिण में धनिष्ठा नवक(वैशाख कृष्ण पक्ष में धनिष्ठा नक्षत्र में चन्द्र प्रवेश से रोहिणी नक्षत्र तन ९ दिन मड़ा पंचक आता हे )प्रवेश से निवृति तक अन्य होलाष्टक में मुहूर्त नही देते
परन्तु खास कर गुरु और शुक्र के अस्त जितने दिन का हो उतने दिन विवाह कार्य के लिए निषिद्ध हे
प्रथम गर्भ से उत्पन्न लड़का जयेष्ठ कहा गया हे और प्रथम गर्भ से उत्पन्न लड़की जयेष्ठा अत:ज्येष्ठ माह में ज्येष्ठ लड़का और लड़की का विवाह नही करना चाहिए
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विवाह में वार तिथि
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विवाह मुहूर्त में सभी वार ग्राह्य हे तिथि में कृष्ण पक्ष १३,१४,अमावस्या ,शुक्लपक्ष की प्रतिपदा वर्ज्य हे रिक्त तिथि (४,९,१४ )तिथियो में सामान्य शुभ कार्य त्याज्य होते हे पर विवाह मुहूर्त में माध्यम फलदायक हे अत:रिक्ता तिथि वर्ज्य करनेका कोई कारन नही हे क्षय वृध्धि तिथि त्याज्य हे
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विवाह नक्षत्र
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रोहिणी ,मृगशीर्ष ,मघा ,ऊ.फा,हस्त,स्वाति,अनुराधा,मूल,ऊ.षाढा,ऊ.भाद्र,तथा रेवती यह ग्यारह और
अन्य मत अनुसार अश्विनी,चित्रा,श्रवण,धनिष्ठा,यह पन्द्रह नक्षत्र योग्य हे
खास कर क्रूर नक्षत्र में गृह हो एवं जिस नक्षत्र में ग्रहण हुआ हो वह नक्षत्र त्याज्य हे
विष्कुभादी योगो में अशुभ योगो का काल त्याज्य हे
विष्टि,शकुनी ,चतुष्पद ,नाग,और किस्तुघ्न यह पांच करण त्याज्य हे
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दिन शुध्धि
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तिथि,वार,नक्षत्र के दोष से होने वाले दघ्ध योग ,मृत्यु,यमघंट,काल्मुखी जेसे अशुभ योग विवाहादि कार्यो में त्याज्य नही हे
सूर्य ,चन्द्र और लग्न तथा नवमांश शुध्धि हो तो शास्त्र नियम अनुसार कोई भी दोष मानने का कारण नही हे गुरु/शुक्र लोप पूर्वे वार्द्यक्य तिन दिन ,एवं दर्शन के बाद बाल्यावस्था के तिन दिन त्याज्य हे
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नक्षत्र दोष अपवाद

मृग,ऊ.फा,चित्रा,ऊ.षाढा,धनिष्ठा,विवाह में यह दो राशि वाले नक्षत्र हे इस नक्षत्र में या कोई दो राशि वाले नक्षत्र में क्रूर गृह हो यद्यपि राशि भिन्न हो तो उस राशी नक्षत्र का भाग लेने में हरकत नही हे ,पाप गृह भुक्त और पाप गृह भोग्य नक्षत्र पर से चन्द्र,सूर्य कोई भी शुभ गृह एक बार पसार हो जाने के बाद उसका दोष हल्का बनता हे
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विवाह समय कुंडली लग्न शुध्धि
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सूर्य ३,६,८ भाव ,चन्द्र २,३,४ भाव मंगल ३,६ भाव गुरु ८,१२ भाव को छोड़कर शुक्र १,२,४,५,९,१० भाव शनि,राहू ,केतु ३,६,८ भाव में शुभ हे ११ भाव में हरेक गृह शुभ हे कोई भी लग्न स्वीकार्य हे सिर्फ नवमांश लग्न शुभ होना चाहिए
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अशुभ योग
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लग्न में सूर्य ,१,८,१० भाव में चन्द्र मंगल,अष्टमभाव में शुक्र ,लग्न में शनि राहू केतु ,लग्नेश ६,८ भाव में शुभ नहीं हे
सप्तम भाव में कोई भी गृह अशुभ हे ,राहू चतुर्थ भाव और बुध १० भाव में हो तो नही लेना चाहिए

प्रश्न शास्त्र अनुसार नष्ट वस्तु ज्ञान

प्रश्न शास्त्र अनुसार नष्ट वस्तु ज्ञान
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प्रश्न कुंडली में चतुर्थ भाव चोरी हुई चीज का हे ,यानी चतुर्थ स्थान चोरी हुई चीज कहा हे यह जानने में उपयोगी हे .चतुर्थ भाव में जो राशी हो ,वह राशि चोरी हुई चीज कहा हे उस तरफ इशारा करती हे
मेष ,सिंह ,धन,अग्नि तत्व राशि हे ,यानी उस चीज के पास अथवा जहा आग सम्बन्धी कोई भी कार्य होता हो वहा वृषभ ,कन्या ,मकर पृथ्वी तत्व राशी यानी जमीन के पास या अन्दर दबाई हुई हो ..कर्क ,वृश्चिक,मीन जलचर राशि पानी रखनेकी जगह के पास (घर में )नदी ,दरिया किनारा के पास या पानी में छिपाई हुई हो
चतुर्थ भाव में रहा ग्रह या चतुर्थेश बनता ग्रह चोरी हुई चीज कहा हे उसका दिशा निर्देश करता हे
चतुर्थ स्थान में शनि हो या चतुर्थेश शनि हो तो चीज कोई गन्दी जगह में जहा कूड़ा कचरा फेकने की जगह में छुपाई हे ,,इसी प्रकार चन्द्र हो तो पानी ,बाथरूम ,कुए ,तालाब के पास गुरु हो तो मंदिर ,धार्मिक स्थान या पवित्र जगह मंगल हो तो अग्नि के पास ,शुक्र हो तो बिस्तर के पास -निचे या आजूबाजू ,बुध हो तो लायब्रेरी (किताबे रखने की जगह )रसोई घर और सूर्य हो तो घर के मुखिया के बेठने की सिट के आसपास छुपी हुई हे
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नष्ट वस्तु दिशा ज्ञान
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दिग्वाच्या केंद्रगतैरससंभवे वा वदेद्विलग्नर्क्षात्|
मध्याच्च्युतैर्विलग्नान्नवांशकैर्योजना वाच्या||(षट पंचाशिका ६/४)
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अर्थ
केंद्र स्थित बलवान गृह से नष्ट वास्तु की दिशा का विचार करना चाहिए
यह संभव न हो तो लग्न में स्थित राशी की दिशा के अनुसार निर्णय करना चाहिए लग्न स्थित नवमांश अनुसार वास्तु की दुरी का निर्णय करना चाहिए
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प्रस्तुत श्लोक नष्ट वस्तु की दिशा और दुरी का निर्देश करता हे
केंद्र में स्थित ग्रह से नष्ट वस्तु की दिशा का निर्णय करना चाहिए जो केंद्र में एक से ज्यादा ग्रह हो तो सबसे ज्यादा बलवान ग्रह से दिशा निर्णय करना चाहिए
केंद्र में सभी ग्रह निर्बल हो या केंद्र में ग्रह न हो तो लग्न में जो राशी हो उस राशी द्वारा निर्णय करना चाहिए
लग्न में प्रथम ,द्वितीय........नवम जो नवमांश हो उस से वस्तु की दुरी का निर्देश करे
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सूर्यादि ग्रहों की दिशा
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सूर्य - पूर्व दिशा
मंगल -दक्षिण दिशा
शनि-पश्चिम दिशा
बुध -उत्तर दिशा
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शुक्र -अग्नि कोण
राहू- नैरुत्य कोण
चन्द्र -वायव्य कोण
गुरु -ईशान कोण
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मेषादि राशि अनुसार दिशा
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मेष ,सिंह,धन-पूर्व दिशा
वृषभ,कन्या ,मकर -दक्षिण दिशा
मिथुन,तुला,कुम्भ -पश्चिम दिशा
कर्क ,वृश्चिक ,मीन - उत्तर दिशा

मारक विचार ....

मारक विचार ....
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मारक व्याख्या
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अष्टमं ह्यायूष: स्थानमष्टमादष्टमं च यत् |
तयोरपि व्ययस्थानं मारकस्थानमुच्यते ||
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अर्थ
जन्म लग्न से अष्टम स्थान आयुष्य स्थान हे तथा अष्टम स्थान से अष्टम (तृतीय )स्थान भी आयुष्य स्थान हे यह दोनों आयुष्य स्थान से द्वादश स्थान को मारक स्थान कहा जाता हे
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प्रस्तुत श्लोक में मारक ग्रह की व्याख्या की हे जन्म लग्न से अष्टम स्थान आयु का स्थान हे "भावत् भावम् " नियम अनुसार अष्टम से अष्टम तृतीय स्थान भी आयुष्य स्थान हे यह दोनों आयु स्थान से द्वादश स्थान मारक स्थान हे सप्तम और द्वितीय स्थान निश्चित हुए
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तत्राप्याद्यव्ययस्थनाद् द्वितीयं बलवत्तरम्|
तदीशितुस्तत्र गता: पापिनस्तेन संयुता:||
तेषां दषाविपोकेषु संभवे निधंम नृणाम्|
तेषामसंभवे साक्षाद् व्ययाधीशदशास्वपि||
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अर्थ
दोनों मारक स्थान (द्वितीय /सप्तम )में सप्तम स्थान से ज्यादा द्वितीय मारक स्थान बलवान हे मारक स्थान में पाप ग्रह हो और मारकेश से युक्त हो तो
मारक स्थान स्थित पाप ग्रह की महादशा /अन्तर्दशा में मृत्यु होती हे
जो उसकी दशा में मृत्यु संभव न हो तो जन्म लग्न से व्ययेश की दशा में मृत्यु
होती हे
प्रस्तुत श्लोक में मारक का निर्णय केसे करना हे यह दर्शाया हे दोनों मारक स्थान में द्वितीय मारक स्थान ज्यादा बलवान कहा गया हे मारक स्थान में पाप ग्रह मारकेश से युक्त हो तो मारक स्थान स्थित पाप ग्रह की दशा अंतर में मृत्यु होती हे ऐसा संभव न हो तो द्वितीयेश की दशा में मृत्यु होती हे इस में भी मृत्यु संभव न हो तो सप्तमेश की दशा में मृत्यु होती हे
यहाँ मारक स्थान स्थित पाप ग्रह को प्रबल मारक कहा गया हे तद्पश्च्यात मारकेश स्वयं मारक बनता हे अगर यह भी संभव न हो तो व्ययेश की दशा में
मृत्यु होती हे
यहाँ 'संभव "शब्द सूचित करता हे की मारक स्थान स्थित पाप ग्रह की दशा या मारकेश की दशा अंतर में मृत्यु हो जाये यह निश्चित नही हे
मृत्यु का संभव कब होता हे यह जानना जरुरी हे
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वैदिक ज्योतिष में आयु निर्णय के लिए पूर्वाचार्यो ने विभाग निश्चित किये हे
१)अल्पायु -जन्म से ३२ वर्ष
२)मध्यम आयु -३२ से ६४
४)दीर्घ आयु -६४ से १००
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जैमिनी सूत्र अनुसार आयु निर्णय
१)लग्नेश अष्टमेश चर राशी में हो अथवा लग्नेश स्थिर राशी में और अष्टमेश द्विस्वभाव राशी में हो अथवा लग्नेश द्विस्वभाव राशी में और अष्टमेश स्थिर राशी में हो तो दीर्घ आयु
लग्नेश और अष्टमेश द्विस्वभाव राशी में हो अथवा लग्नेश चर राशी में और अष्टमेश स्थिर राशी में हो अथवा लग्नेश स्थिर राशी में और अष्टमेश चर राशी में हो तो मध्यम आयु
लग्नेश +अष्टमेश -स्थिर राशी
लग्नेश चर राशी +अष्टमेश द्विस्वभाव राशी
लग्नेश द्विस्वभाव राशी +अष्टमेश चर राशी में हो तो अल्प आयु
२)लग्नेश तथा शुभ ग्रह केंद्र में हो तो दीर्घ आयु
पणफर में हो तो मध्यम आयु
ओपोकिलम में हो तो अल्पायु
३)अष्टमेश तथा पाप ग्रह केंद्र में हो तो अल्प आयु
पणफर में हो तो मध्यम आयु
ओपोकिलम में हो तो दीर्घ आयु
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उपरोक्त नियम अनुसार या अन्य आयु निर्णय के नियम अनुसार जातक अल्पायु ,मध्यम आयु ,या दीर्घ आयु हे यह निर्णय कर के जातक के मृत्यु का अनुमान करना चाहिए और इस काल समय में आने वाली मारक दशा में मृत्यु का फलादेश संभव हो सकता हे उस से पहेले आने वाली मारक दशा में मृत्यु नही होती पर शारीरिक कष्ट या मृत्यु तुल्य कष्ट संभव हे
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उपरोक्त सिध्धांत अनुसार मारक की स्थिति
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१)२,७,१२ मारक स्थान हे
२)मारक स्थान के अधिपति मारक बनते हे
३)मारक स्थान स्थित ग्रह मारक बनते हे
४)द्वितीयेश ,सप्तमेश युक्त ग्रह मारक बनते हे
५)पाप ग्रह मारक ग्रह से द्रष्ट या युक्त हो तो मारक बनते हे
६)द्वितीयेश /सप्तमेश चन्द्र या सूर्य हो तो मारक नही बनते
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बारह लग्न में मारक ग्रह
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१)मेष -शुक्र बुध ,शनि मारक बनते हे (शुक्र दशा में मृत्यु नही होती कष्ट होता हे )
२)वृषभ लग्न -बुध और मंगल मारक हे (बुध द्वितीय /सप्तम स्थान में हो तब मारक बनता हे )गुरु मारक के गुणों से युक्त हो तो मारक बनता हे
३)मिथुन लग्न -मंगल मारक बनता हे चन्द्र मारक नही बनता
४)कर्क लग्न - बुध ,शुक्र ,शनी का मारक के रूप में विचार करना चाहिए .यहाँ सूर्य मारक नही बनता
५) सिंह लग्न -बुध ,शनि
६)कन्या लग्न -मंगल प्रबल मारक साथ में गुरु का विचार करना चाहिए शुक्र मारक नही बनेगा
७)तुला लग्न - गुरु प्रबल मारक ..मंगल
८)वृश्चिक -बुध ,शुक्र ,शनि
९)धनु -शुक्र ,शनि
१०)मकर - गुरु ,साथ में मंगल का विचार करना चाहिए
११)कुम्भ -गुरु ,पाप ग्रह मारक बनते हे
१२)मीन -शुक्र ,शनि ...मंगल मारक नही बनेगा
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साभार -लघु पाराशरी

कन्या विवाह और गुरुबल

कन्या विवाह और गुरुबल
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स्त्रीणां गुरुबलं श्रेष्ठं
पुरुषाणां रवेर्बलम।
तयो:चंन्द्रबलं श्रेष्ठमिति गर्गेण
भाषितम॥
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भावार्थ-स्त्री के लीये गुरुबल और पुरुष के
लीये सूर्यबल और दोनो के लीये चंद्रबल
देख के विवाह करना श्रेष्ठ हे
ऐसा गर्गादी ऋषी कहते हे
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कन्या के विवाह समय कन्या की जन्म
राशि या नाम राशि से 4,8,12 वा गुरु
चल रहा हो तो उस समय विवाह
नही करना चाहीये
.
परंतु यह वचन उस समय का हे जब बाल
विवाह होते थे आज के जमाने मे
परीस्थिती भीन्न हे
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नारदजी का मत गुरुबल के विषय मे
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गुरुरबलो रविरशुभ:प्राप्त े ऐकादशाब्दं
या कन्या ।
गणयति गणक विशुद्ध: स
गणको ब्रह्रिहा भवति ॥
,
ऋषि नारद कहते हे जो कन्या 11 साल से
उपर की हो और विवाह मुहूर्त मे
ज्योतिषी पंडीत गुरुबल या सूर्य बल
की गीनती करता हे वह ब्रह्म हत्या के
पाप का भागीदार बनता हे
.
रजस्वलाया: कन्याया:गुरुशुद ्धिँ न
चिन्तयेत ।
सर्वत्रापि शुभं दद्याद द्वादशाब्दात
परं गुरु:॥
.
भावार्थ-रजस्वला होती कन्या या 12
साल से उपर की कन्या के लीये गुरुबल
का विचार नही करना चाहीये यहा गुरु
शुद्ध ही हे
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अतिप्रोढा तु या कन्या कुलधर्म
विरोधिनी।
अविशुद्धापि सा देया चन्द्रलग्नबलेनत ु॥
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भावार्थ-अतिप्रो ढा यानी 16 साल से
उपर की कन्या के लीये गुरुबल
नही देखना चाहीये चंद्रबल दिनशुद्धि और
लग्नबल देखके विवाह करना चाहीये